हरियाली से घिरे उस सूखे पेड़ से पूछो – तनहाई क्या होती है।
टूटे हुए पत्थर से पूछो – अपनो से जुड़े रहने की एहमियत क्या होती है।

मौत से तड़पते उस परिंदे से पूछो – ज़िंदगी क्या चीज है।
बिखरे उस घर से पूछो – रिश्ते क्या चीज होती है।

रिश्तें सस्ते नहीं होते साहब – पूछो उससे; दुनियामें ‘लावारिस’ हि जिसकी पहचान होती है।

~ आज़ाद परिंदा.


Epidemic of Pessimism & Panacea for Life …

With day by day exposure to new & weird individuals, life is becoming a wondering puzzle for me. With no exception everyday I am experiencing extremely frustrated people moving around me who believe that they are not capable enough to bravely face harsh realities of life. Unmet expectations about themselves, insecurity and uncertainty about successful “perceived easy” life, or sudden exposure to challenges (which are completely new to such dependent fellows who have become habitual to parental source of everything) all of which would definitely be the reason behind such extreme pessimism. Under this scenario one can found it extremely difficult to cope up with sudden & growing epidemic of pessimism which is extremely harmful for inner peace of mind & enthusiasm in daily life. A novice like mine in this journey of life can’t say anything more than this :

Lack of enthusiasm is first & the worst of all steps leading towards Depression…
Depression is contagious; unenthusiastic people spread it….
Hence, Beware of unenthusiastic & unhappy souls.
In this situation, I am happy to have very few but truly amazing optimistic, cheerful, enthusiastic travellers who are always there with me to accompany and to please me all the time. I am happy to have them whenever I need them & whenever I just want to be with them. To be and remain happy; healthy & wealthy a combination of serenity of mind & enthusiasm in life seems to be a panacea for everything.

Hence Love You Zindagi !!



Driven by Dreams …

A dream itself is a driving force…

A dream itself is a driving force…

For days and nights, if we follow our dreams then there is no chance of getting infected with negative emotions. I have seen most intelligent, financially stable people being demolished by consequences of not doing those things which not at all make them happy. This is nothing but result of doing something very hard to fulfill somebody else dream. Through “job system” (I will say it’s nothing but modern form of intellectual slavery) most of us are programmed to such an extent that, we even can’t recall what were our dreams and like a paid slave we do keep our self engaged in ‘work n wage cycle’.
Rather being proud of, the phrase ‘I am employee’ of XYZ firm, must be taken as slang. We are trained in academic institutions to be complacent with ‘salaried employment’. People love their job as it pays off. But they can not understand hidden reality behind it. Job is nothing but a form of “paid slavery”. We spend our precious time, efforts even dreams to fulfil somebody else desires. Simply it has been described by Dhirubhai Ambani as If you don’t build your dream, someone else will hire you to help them build theirs.

मुन्सी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता

मुन्सी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता

ख्वाहिश नहीं मुझे
मशहूर होने की,

आप मुझे पहचानते हो
बस इतना ही काफी है.

अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा जाना मुझे,

क्यों की जिसकी जितनी जरूरत थी
उसने उतना ही पहचाना मुझे.

जिन्दगी का फलसफा भी
कितना अजीब है,

शामें कटती नहीं और
साल गुजरते चले जा रहें है.

एक अजीब सी
दौड है ये जिन्दगी,

जीत जाओ तो कई
अपने पीछे छूट जाते हैं और

हार जाओ तो
अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं.

बैठ जाता हूँ
मिट्टी पे अकसर,

क्योंकि मुझे अपनी
औकात अच्छी लगती है.

मैंने समंदर से
सीखा है जीने का सलीका,

चुपचाप से बहना और
अपनी मौज मे रेहना.

ऐसा नहीं की मुझमें
कोई ऐब नहीं है,

पर सच कहता हूँ
मुझमें कोई फरेब नहीं है.

जल जाते है मेरे अंदाज से
मेरे दुश्मन,

क्यों की एक मुद्दत से मैंने,
…. न मोहब्बत बदली
और न दोस्त बदले हैं.

एक घडी खरीदकर
हाथ मे क्या बांध ली

वक्त पीछे ही
पड गया मेरे.

सोचा था घर बना कर
बैठुंगा सुकून से,

पर घर की जरूरतों ने
मुसाफिर बना डाला मुझे.

सुकून की बात मत कर
ऐ गालिब,

बचपन वाला इतवार
अब नहीं आता.

जीवन की भाग दौड मे
क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?

हँसती-खेलती जिन्दगी भी
आम हो जाती है.

एक सवेरा था
जब हँसकर उठते थे हम,

और आज कई बार बिना मुस्कुराये
ही शाम हो जाती है.

कितने दूर निकल गए
रिश्तों को निभाते निभाते,

खुद को खो दिया हम ने
अपनों को पाते पाते.

लोग केहते है
हम मुस्कुराते बहुत है,

और हम थक गए
दर्द छुपाते छुपाते.

खुश हूँ और सबको
खुश रखता हूँ,

लापरवाह हूँ फिर भी
सब की परवाह करता हूँ.

मालूम है
कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी

कुछ अनमोल लोगों से
रिश्ता रखता हूँ.



कभी कभी हम अपनी अंदर कि बुराईयों से लड़ते – लड़ते,
हमे दिल से चाहने वालो कि अच्छाईयों को नजर अंदाज कर देते हैं।
फिर भी वो हमें चाहते रहते है। … फिर भी वो हमे चाहते हैं।
दिल से चाहे, वहीं तो सच्चे अपने हैं, … वहीं तो सच्चे अपने हैं।


Pleasure of giving …

We become successful by what we get, but we become happy by what we give.

I hv seen many people who receive everything, by still are unhappy. Skills, Money, Status; they may have everything, but they miss the pleasure of giving …

M fortunate to be a part of those few, who experience pleasure of giving …

हमेशा देखा मेने –

लेने वालो के दिल कभी भरे नहीं,

देने वालो के हाथ कभी खाली नहीं।


बड़ी बात …

अच्छे लोग, अच्छी यादें जुटाने के आदत डालें;
जिंदगी से बुरी चीजे अपने आप हट जाऐंगी।

अच्छे लोग, अच्छी चीजें पाना बड़ी बात नहीं;
बुरो के साथ भी अच्छा बने रहना बड़ी बात हैं।

हमेशा खुश रहना बड़ी बात नहीं;
ख़ुश रहकर सब के गम मिटाना बड़ी बात हैं।

खुश रहने के मौके शायद सबको चंद मिलते हैं;
बाकी खुशियों के पल हमे हि जुटाने पड़ते है।

~ आज़ाद परिंदा.

Life Gyan

कभी – कभी हसाएँगी, शायद हमेशा रूलाएँगी…कभी हा – कभी ना, और कभी हा कहकर भी मुकर जाएँगी…

जिंदगी हमेशा अपने रंग दिखाती रहेंगी।पर हमने अंत तक अपना बेस्ट देते रहना है।

अकेला हि सही,..किसीने छोड़ने का गम भी नहीं

मर गया तो घर मे रोने वाला कोई नहीं;
हँसू तो साथ देने वाला कोई नहीं…
पर ये भी सही है कि –
जी भर के जिना चाहू, तो रोकने वाला भी तो कोई नहीं।
तो बोलो ॐ शांति ॐ ..
शांति शांति ॐ ।।
ॐ शांति ॐ, शांति शांति ॐ।।।



वक़्त रहते हि वक़्त कि नज़ाकत को समझो;
और वक़्त रहते हि वक़्त को बदलो।
क्या पता वक़्त कब अपना वक़्त बदल दे,
और हमें वक़्त बदलने का फिर वक़्त हि ना मिले।


~ Diary of Free Bird